हौसलों में अगर जान हो तो मंजिल पाई जा सकती है

गरिमा  जब जान्हवी महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ रही थी तो उनको बोझ लग रहा था और उनको कभी एहसास नहीं था कि वही समूह एक दिन उनकी जिंदगी में खुशियां लेकर आयेगा। आज गरिमा बड़े गर्व से बताती है कि जान्हवी समूह ने उनके सपनों को शिखर तक पहुँचाया। गरिमा बताती है कि समूह से अबतक कुल एक लाख रुपये आठ बार मे लेकर लझमी गारमेन्ट की दुकान नवगिरवा चौराहे पर खोली औऱ उसी दुकान से कमाकर एक लाख रुपये समूह का कर्ज वापस कर दिया है। आज दुकान में लगभग दो लाख का समान दुकान में है प्रतिदिन लगभग 500 से 1000 रुपये की आमदनी हो जाती हैं गरिमा कहती है यह सम्भव हो सका राजीव गांधी महिला विकास परियोजना के माध्यम से अगर परियोजना नही होती तो मेरा पूरा परिवार गरीबी की कुचक्र रेखा में फंसा होता जिंदगी को सँवरने का मौका मिला और साबित कर दिया कि हौसलों में अगर जान हो तो मंजिल पाई जा सकती है।